काशीराम धनवंतरि
From the post of Ashok Madhup:
काशीराम धनवंतरि
काशीराम धनवंतरि जी मेरे कुटुंब के दादा होते थे।झालू में छतरी वाले कुएं और हमारे घर के बीच दक्षिण में उनका शफाखाना और उसके पीछे उनका घर होता था।शफाखाने में उनका बैठने और मरीज देखने का स्थान अलग− अलग था।बैंच डालकर मरीजों के बैठने की व्यवस्था थी।मरीजों के बैठने के कक्ष के पीछे उनका आराम कक्ष था।इनके मरीज देखने के स्थान के उत्तर में इनका औषधि कक्ष था।
उनके शफाखाने में चारों ओर अलमारी लगी थीं।इन अलमारियों में आयुर्वेद का दुर्लभ साहित्य होता थी।
वैद्य जी मुझे और मेरे छोटे भाई को बहुत प्यार करते थे।उन्होंने अपनी पुस्तक कभी किसी को पढ़ने के लिए नहीं दीं।किंतु मुझे कभी मना नही किया। मेरा छोटा भाई अजय झगड़ालू था।उसका झगड़ा हो जाता।वैद्य जी को पता चल जाता तो वह अपना बैंत उठाते और छोटे भाई का लेकर झगड़ा होने वाले परिवार के यहां पहुंच जाते। वैद्य जी का बड़ा सम्मान झगड़ा करने वाले का पिता वैद्य जी को देखकर अपने बेटे को डांट देता और मामला खत्म हो जाता।
जाड़ों में वह शफाखाने के बाहर चबूतरे पर कुर्सी पर बैठे होते। उनके पांव के पंजे पर बड़ा एक्जीमा था। उसे वह चाकू से खुरचते रहते। कोई मिलने आ जाता तब भी उनका यह कार्य जारी रहता।
बिजनौर के दो परिवारों में उनकी बड़ी आत्मीयता थी। उनका आना जाना था। बिजनौर के प्रसिद्ध रईस कुवंर आदित्यवीर और पत्रकार मुनीश्वरानन्द त्यागी जी से उनकी बड़ी दोस्ती थी।बिजनौर आते तो दस−दस , 15−15 दिन इन परिवार में रहकर जाते।
कुंवर आदित्यवीर ही नहीं उनकी पत्नी कैबनेट मंत्री चंद्रावती जी से भी उनकी निकटता थी।कुंवर आदित्यवीर के बेटे डा वीरेंद्र अमेरिका गए और वहीं बस गए। बिजनौर प्रवास के दौरान मुझे कई बार मिले।उनसे एक बार वैद्य जी का जिक्र आ गया।बोले – वैद्य जी हमारे ताऊ जी थे।काफी −काफी दिन हमारे घर रह जाते। वह अपने पास हाथ का एक थैला रखते थे।उसमें उनका सामान होता। डा. वीरेंद्र बताते हैं कि जब वैद्य जी जाने को होते तो हम उनका थैला छिपा देते।इससे वह कुछ दिन और रूक जाते।
वैद्य जी के पास मैने शायद ही कभी मरीज देखा हो।किंतु उनका रहन सहन सदैव संपन्न व्यक्ति जैसा रहा।लोग बताते थे कि उनके मरीज संपन्न व्यक्ति ही होते थे।देश ही नही विदेश में भी उनके मरीज थे। उन्हें वह पार्सल से दवा भेजते रहते थे।
वैद्य जी को हारमोनियम बजाने का शौक था। उनके पास कुर्सी पर बैठकर बजाने वाला हारमोनियम था।उसे पांव से पंप किया जाता था। वैद्य जी जब खाली होते तो हारमोनियम बजाते।रामलीला में वह परशुराम और दशरथ का पाठ करते थे।
वैद्य जी कुंवर आदित्यवीर के बहुत नजदीकी थे।कुंवर आदित्यवीर की अपनी नाटक मंडली थी। इस मंडली को लेकर कुंवर आदित्यवीर मुंबई चले गए। वैद्य जी भी इनके साथ थे।वहां इनके प्रदर्शन की तारीफ होने लगीं। शो के टिकट पूरे बिकने लगे। एक दिन शो की पहली रात में इनके थियेटर की स्टेज में आग लग गई। इन्हें टिकेट के पैसे लौटाने पड़े।मजबूरन वापस लौट आए।अगर स्टेज में आग न लगती तो मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में बिजनौर का बड़ा नाम होता।
वैद्य जी बहुत विद्यान थे। वे प्रायः पढ़ते रहते। उनके सामने बड़े− बड़े विद्वान नही टिक पाते थे।
वैद्य जी के कोई पुत्र नही था। उनके एक बेटी बेटी संतोष थी। संतोष की बाबूगढ़ छावनी के पास किसी गांव में शादी हुई थी।संतोष के पति का नाम शायद ओमप्रकाश था।ये डाक्टर थे।इनका बाबूगढ़ छावनी स्टेशन से बाबूगढ़ जाने वाले रास्ते के चौराहे पर क्लिनिक था।
मैं पत्रकारिता में रम गया।वैद्य जी की पत्नी का पहले ही निधन हो गया था।मैं बिजनौर में था कि वैद्य जी का भी निधन हो गया।मुझे पता ही नही चला।मैं चाहता था कि उनकी पुस्तकें मुझे मिल जांए किंतु पता चला कि उनके दामाद सारा पुस्तकालय अपने साथ ले गए। मकान भी बेच दिया।
(अशोक मधुप की पुस्तक परिचित चेहरे का एक अंश);
comments;
I knew Vaid ji very closely. I used to visit his home and family occasionally; Family was very loving, caring and affectionate . Santosh was very beautiful girl like her mother.Vaid jee started his clinic in a rented shop of Shri Lala Asharfi Lal ji (Kothiwale), then later moved in his own premises constructed by himself near and adjacent to the temple. Vaid jee was very jovial and social person, will be a child among the children, old man among the seniors though ever young man himself. I very well remember his funny Ravanayan just opposite description of Ramayan. He was a member of the group of Shri Kashinath Mahashey, Munshi Ram Krishan Lal and Dr. Brij Bhushan Saran Gupta. His visibilty was very high especially in all the social events like Dramas, Ram Leela etc.
मैं वैद जी को
बहुत करीब से जानता था। मैं कभी-कभी उनके घर और परिवार के पास जाता था; परिवार बहुत प्यार करने वाला, देखभाल करने वाला और स्नेही था।
संतोष अपनी माँ की तरह बहुत सुंदर लड़की थी। वैद जी ने श्री लाला अशर्फी लाल जी
(कोठीवाले) की एक किराए की दुकान में अपना क्लिनिक शुरू किया, फिर बाद में मंदिर के पास और बगल
में अपने स्वयं के द्वारा बनाए गए परिसर में चले गए। वैद जी बड़े ही हँसमुख और
सामाजिक व्यक्ति थे, बच्चों में बालक होंगे, बड़ों में बूढ़े होकर भी स्वयं जवान
ही रहेंगे। मुझे रामायण के ठीक विपरीत वर्णन करने वाला उनका मज़ेदार रावणायन बहुत
अच्छी तरह याद है। वे श्री काशीनाथ महाशय, मुंशी राम कृष्ण लाल और डॉ. बृजभूषण
सरन गुप्ता के समूह के सदस्य थे। विशेषकर सभी सामाजिक कार्यक्रमों जैसे नाटक, राम लीला आदि में उनकी दृश्यता बहुत
अधिक थी
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